Friday, September 9, 2011

देखा है


आसमां में चाँद को बढते देखा है
मैंने लोगो को बदलते देखा है

रखते है जो अपने चेहरे पे हंसी
मैंने उनके हाथो में खंजर देखा है

गुजारा था जिस आँगन में बचपन
लोगो को वो आँगन छोड़ते देखा है

मंदिर मस्जिद में वो मिला नहीं मुझे
मैंने लोगो में भगवान देखा है

वो चाहे इन्कार करते रहे कुलदीप
लेकिन उनकी आँखों में मैंने प्यार देखा है