Thursday, June 3, 2010

मंजर

फिर वही  मंजर
फिर  वही  शांम 
हर  और  बिखरा  है  देखो 
मौत  का  सामान
सहमा  सहमा  सा  है 
हर  शख्स  यहाँ
है  डर  सीने  में  उसके 
की  जाए  कहा
हर  और  खून  से  लथपथ 
पड़े  हुए  है  लोग
ये  कैसा  भयानक  मंजर  है 
किसका  है  ये  दोष
वो  मॉस  का  लोथड़ा  बन 
पड़ा  हुआ  है  किसी  का  बाप 
वो  भाई  देख  रहा  है  देखो 
खून  से  लथपथ  बहन  की  लाश
वो  रोता  बच्चा  ढूँढ  रहा  है 
माँ  को  अपनी  यहाँ  वहा
वो  दादा  सोचे  खड़ा  खड़ा 
पोता  मेरा  गया  कहा
चीखती  चिल्लाती  आवाजे 
हर  और  सुनाई  पड़  रही
अपने  ही  शहर  में  हमको  अपनी 
जान  पराई  लग  रही
हर  और  धुआ  ही  धुआ  है 
और  है  धमाको  की  गूँज
इस  धुए  में  बोझल  हो  गयी
जैसे  जिंदगी  की  धूप
इस  धुए  में  बोझल  हो  गयी
जैसे  जिंदगी  की  धूप

3 comments:

  1. Bahut Khoob!
    Dard ko bakhoobi ukera hai shabdon mein aapne!

    ReplyDelete
  2. बेहतरीन अभिव्यक्ति!

    ReplyDelete
  3. yatharth ka achha chitran kiya hai..

    ReplyDelete